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आप लोगो ने मल्हार गंज थाने के सामने लाल अस्पताल तो देखा ही होगा. आपको पता है इस लाल अस्पताल को सन १९४४ में राजकुमारी मनोरमा राजे ने टी. बी. रोग के अस्पताल के रूप में शुरू किया था जो की अब लाल अस्पताल के नाम से जाना जाता है |
लाला अस्पताल के परिसर में एक बावड़ी भी है जिसे तात्या जोग की बावड़ी के नाम से जाना जाता है. तात्या जोग जिनका वास्तविक नाम विठठल महादेव किबे था वे एक जुझारू किस्म के योद्धा थे और किबे परिवार से थे वे होलकर राज्य में मंत्री थे वास्तव में उनके गुरु का नाम तात्या जोग था पर उनके देहावसान पर विठठल जी ने उनका नाम अपना लिया सन १८८६ में इस बावड़ी का नाम तात्या जी के नाम पर रख दिया गया. शुरुवात में ये सारी जमीं किबे परिवार की थी | बावड़ी के पास में एक गणेश मंदिर भी है सिद्ध विनायक मंदिर, पास में और भी मंदिर भी है | 
Boundary के पास की दूकानों का किराया आज भी किबे परिवार को जाता है जो की हेरम्ब पारमार्थिक ट्रस्ट को जाता है, हेरम्ब गणेश भगवन का एक नाम है किबे परिवार हर काम की शुरुवात हेरम्ब नाम से ही करते थे | पहले किबे परिवार के बारे में एक बात Famous थी की " होलकर का राज और किबे का ब्याज " मसलन होलकर राज्य का जितना बजट होता था उतना ही किबे परिवार का ब्याज होता था | तात्या की बावड़ी से  सन १९९० तक नगर निगम के टेंकरों से पानी भरा जाता था तब बावड़ी के पानी की मोटी धार से टेंकर १०-१५ मिनट में भर जाते थे | जब इंडियन आयल डेपो में आग लगी थी तो इसी बावड़ी के पानी से सारी आग बुझाई गयी थी यह आग २-३ तक जारी थी | यह बावड़ी ६० फीट गहरी और ३० X ३० चोडी है अब इसकी आव बंद हो गई है पर इसकी मजबूती के कारण आज भी ये अपना स्वर्णिम  युग याद दिलाती है |
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