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देश के फ़िल्मी नक़्शे में इंदौर महानगर का महत्वपूर्ण स्थान हमेशा से रहा है | तीस सिंगल स्क्रीन सिमटकर भले ही गिनती की रह गई है , पर इस घाटे को इंदौर में मल्टीप्लेक्स ने पूरा कर दिया है |

इंदौर में सिनेमा कैसे आया, इसकी भी एक अलग कहानी है | 7 जुलाई, 1896 में पेरिस से चलकर ल्युमिएर ब्रदर्स का सिनेमा बम्बई की तत्कालीन वाटसन होटल में आया था | उसके इक्कीस साल बाद 1917 में वह इंदौर आया | आज के जवाहर मार्ग पर तब वाघमारे का बाड़ा था उसी बादे में खुले आसमान के नीचे कार्बेटर की रौशनी में छोटी-छोटी गूंगी फिल्मे दर्शको को दिखाई जाती थी | सभी फिल्मे विदेशी होती थी, क्योकि भारत में फिल्म निर्माण धीमी गति से चल रहा था | कुछ छोटी फिल्मे, वृतचित्र और न्यूज़रील मिलाकर दो से ढाई घंटे का मनोरंजन पैकेज बनाया जाता था | प्रोजेक्टर हाथ से घुमाया जाता था | कभी चित्र परदे पर तेज दौड़ते नजर आते, तो कभी धीरे | दर्शको के लिए सबसे बड़ा अजूबा और चमत्कार था, चित्रों का मनुष्य की तरह चलना-फिरना | मजे कि बात यह भी थी कि वे जहा गए ही नहीं, वहा के दृश्य उनके सामने हाजिर हो जाते थे |
डबल प्रोग्राम- आज के मार्केटिंग का यह फंडा है कि एक खरीदो एक मुफ्त पाओ, लेकिन 1917 के दौर में भी सिंगल टिकट में डबल मनोरंजन होता था | सिनेमा के परदे के सामने नाचने-गाने और बजाने वाले लोगो का एक दल बैठता था | वह फिल्म के बीच बेकग्राउंड म्यूजिक का काम करता था | इंटरवल में नाचने-गाने वाले अपने हुनर से दर्शको को लुभाते थे |
हमने पहले भी एक लेख में नवीनचित्रा सिनेमाघर के बारे में बताया था जहा आप आधे टिकट का भी लुत्फ़ उठा सकते था |

अठारह महीनो के बाद नंदलालपुरा थियेटर के पास रायल सिनेमा आया, जो टेंट में दिखाया जाता था |

1918 में बोराडे का थियेटर बना | सेठ मन्नालालजी और सेठ धन्नालालजी ने मोरोपंत सावे की भागीदारी में इसे चलाया | शाम को अँधेरा होने पर इसमें दो शो होते थे | लोग जान-पहचान वालो से नजरे बचाकर फिल्म देखने जाते थे | महिलाए परदे के पीछे बैठती थी, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम होती थी |
1922 में नरहरी अडसुले ने श्रीकृष्ण टाकीज बनाई | बॉस की खपच्चियो एवं टीन की चादरों से आयताकार शक्ल का सिनेमा था श्रीकृष्ण टाकीज | बाद में इसे पक्का कराया गया | यह रिवरसाइड रोड के पास हीरा लस्सी के पास स्थित था अब इसे ध्वस्त कर दिया गया है | 23 मार्च, 1923 को धन्नालाल-मन्नालाल ने मोरोपंत सावे के साथ मिलकर रिवरसाइड रोड पर क्राउन सनेमा तैयार किया बाद में इसका नाम प्रकाश टाकीज किया गया | वर्तमान में यहाँ प्रकाश प्लाजा है | इन दोनों सिनेमाघरो में टिकट दर दो आने से एक रूपये थी | भारत कि पहली बोलती फिल्म आलमार (1931) का प्रदर्शन श्रीकृष्ण टाकीज में हुआ था | यह फिल्म तीन महीनो तक लगातार चली | इसे देखने दो सौ किलोमीटर दूर से दर्शक आते थे, क्योकि गूंगा सिनेमा अब बोलने लगा था | वी. शांताराम प्रभात फिल्म कंपनी की कई फिल्मे प्रदर्शित करने इंदौर आते और श्रीकृष्ण टाकीज में ही ठहरते थे |

इसके बाद सिनेमाघर निर्माण का सिलसिला चल पद | 1927 में किसनलाल नारसरिया ने सियागंज के मुहाने पर प्रभात सिनेमा शुरू किया | बाद में वह अरुण और बंद होने के पहले एलोरा नाम से जाना गया | एलोरा के कंधे पर अंजता भी कुछ बरसो तक सवार रहा | अब कमर्शियल काम्प्लेक्स में दोनों गम हो गए है | रीगल/डायमंड/नीलकमल (1934), महाराज (1936), मिल्की-वे (1942), सरोज (1946), भारत-नवीनचित्रा / राज (1947), स्टारलिट (1948), यशवंत (1949), अलका/ज्योति (1950), बेम्बिनो (1965), और मधुमिलन (1969) | ये मनोरंजन के प्रमुख केन्द्र हो गए थे | इसके बाद कस्तूर, प्रेमसुख, स्मृति, कुसुम, देवश्री, अभिनवश्री, अभिनयश्री, सपना, संगीता, सत्यम, अनूप, आस्था और मनमंदिर ने अपनी आधुनिक उपस्थिति तथा सुख सुविधाओ से दर्शको को लुभाया |

इंदौर में 1933 से तीन और 1956 से चार शो की परम्परा आरम्भ हुई | सिनेमाघरों में चाय-नाश्ते के केंटिन, पान बीडी की दुकाने, सायकिल-कार स्टैंड की व्यवस्था पुरानी है | इंटरवल में कुल्फी-मूंगफली-समोसे हाल के अंदर बेचने की सुविधा भी कुछ टाकीजो ने दी थी | टिकट-दर एक रूपये से पाच रूपये ( बालकनी ) बरसो तक रही | पिछले कुछ दशको में मल्टीप्लेक्स का दौर शुरू हुआ और इंदौर का पहला मल्टीप्लेक्स वेलोसिटी-||| बना | आम आदमी के सपनो का मनोरंजन दिनोदिन दूर होता गया | मल्टीप्लेक्स में पचास रूपये से लेकर पाच सौ रूपये तक के टिकट है | ये समय के अनुसार, दिन के और सितारों से सजी फिल्मो के अनुसार कम ज्यादा होते रहते है | पहले एक दिन में किसी एक फिल्म के पाच शो से ज्यादा नहीं हो पाते थे |

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