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वल्र्ड हैरिटेज डे विशेष- 250 साल पुरानी इमारत में छुपा है मालवा का स्वर्णिम इतिहास, मुस्लिम, राजपूत, मराठा और इतावली चारों स्थापत्य के मिश्रण वाली अनोखी ऐतिहासिक इमारत

मालवा और होलकरों की बात हो तो इंदौर के राजबाड़े का जिक्र होना लाजमी है लेकिन क्या आप जानते हैं शहर की शान कहलाने वाले राजबाड़े ने अपने सीने में कितने दर्द छुपा रखे हैं। तीन बार आग की लपटों को सहन कर चुका ये भवन आज भी उस पहली आग से नहीं उबर पाया जो सिंधिया वंश ने होलकरों से दुश्मनी के चलते इस भवन में लगाई थी। राजबाड़ा की हालत यह हो गई है कि प्रशासन द्वारा लाख प्रयास के बाद भी इसको बचाना मुश्किल हो रहा है। थोड़े थोड़े समय के अंतराल में इस
का कोई न कोई हिस्सा गिर जाता है और प्रशासन फिर इसकी मरम्मत में लगा रहता है।

सिंधिया ( scindia family ) को बहुत खटकती थी होलकर की समृद्धि :

सन् 1747 में होलकर वंश के मल्हारराव होलकर ने अपने परिवार के निवास के लिए इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण कराया था। लेकिन होल्कर साम्राज्य की समृद्धि सिंधिया घराने के तत्कालीन शासक दौलतराव सिंधिया को बहुत खटकती थी। उन्हीं के कहने पर सन् 1801 में सिंधिया घराने के सेनापति सरजेराव घाटगे ने होलकरों के इस भव्य भवन को जला दिया। 1801 में जो आग लगाई गई उसकी लपटें तो बुझ गई लेकिन राजबाड़े के जलने का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि ये एतिहासिक भवन तीन बार भयंकर आग की लपटों में झुलस गया।


इसी भवन में हुआ इस वंश का प्रथम राजतिलक :

सिंधिया ने जब ये भवन जलाया तब प्रवेश द्वार के ऊपर की पांचवी मंजिल बुरी तरह जल गई थी, होलकरों के तत्कालीन प्रधानमंत्री तात्याजोग ने जी-जान लगाकर इस मंजिल को ठीक किया ही था कि कुछ सालों बाद 1834 में दोबारा राजबाड़ा में आग लगी तब लकड़ी की बनी एक मंजिल पूर्णत: नष्ट हो गई लेकिन होलकरों ने अपने इस प्रिय भवन को ही अपना निवास स्थान बनाए रखा। यहीं पर तुकोजीराव को गोद लिया गया और इस वंश का प्रथम राजतिलक भी इसी भवन में हुआ।


दंगों की चपेट में ये एतिहासिक भवन :

समय गुजरता गया और राजबाड़ा मालवा की यादों को अपने ह़ृदय में संजोता चला गया लेकिन 1984 में एक बार फिर इस भवन पर संकट आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की विवादास्पद मौत के बाद हुए दंगों की चपेट में ये एतिहासिक भवन भी आ गया और दंगाईयों ने इसके गरिमामयी इतिहास को एक बार फिर ध्वस्त कर दिया। इस बार राजबाड़े में जो आग लगाई गई उससे इस भवन को अपूर्णिय हानि हुई। इस बार इस भवन का पृष्ठ भाग इस हद तक जल गया कि उसमें सुधार की संभावना ही नहीं रही।
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